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Sunday, 4 June 2017

तीन मन्त्र : शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो........



दोस्तों आज सविंधान को लागु हुए वर्षों बीत गए और हम शिक्षित भी हो रहे है परन्तु कहीं न कहीं हम दो बातों में अब भी असफल है।
वो बातें है संगठित होकर ,अत्याचार के खिलाफ संघर्ष करना ।।
मैं नहीं जानता मैं आपकी नजर में सही हूँ या नही पर उपरोक्त बातों पर मुझे विश्वास है की हम अब भी असफल है ।।।
हमारे इस असफलता का कारण कुछ और नही बल्कि अपने ही समाज के कुछ उच्च शिक्षित लोग जो उच्च पदों पर तो है पर शायद वो अपने कर्तव्यों को भूल गए है , कुछ चटूकारिता में मस्त है ,और कुछ समाज से इस कदर कटे है  कि उन्हें उनके भाई याद नही आते यद्दपि वो तो अपने को इस समाज का समझते ही नही । यहाँ के पिछड़े लोगो को नेतृत्व चाहिए लेकिन जिनमे नेतृत्व  की क्षमता है वो वो साथ देना नही चाहता ताकि उसकी छवि सवर्णों में न ख़राब हो ।।
वास्तविक समस्या की एक मूल जड़ यह भी है की हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र में निवास करता है और उसकी शिक्षा की गति तो बहुत ही धीमी है ।।जागरूकता का आभाव वहां साफ़ देखा जा सकता है की अब भी हमारे लोग पाखंडवाद में असीम विश्वास करते है।
मैं नहीं जनता ये लिखना कितना तर्कसंगत है लेकिन हमारे समाज की स्वतंत्रा अब भी पूरी नही है और तब तक नहीं हो सकती जब तक वो  पाखंड के घेरे में फंस कर पैसा और समय दोनों बर्बाद करते रहेंगे और अपने से ज्यादा इंद्र में आस्था दिखा इंद्रजाल में फँसते रहेंगे ।।
डॉ. अम्बेडकर ने नीग्रो गुलामी की तुलना भारत के अछूतों से करते हुए कहा था की नीग्रो गुलामी एक प्रत्यक्ष गुलामी है जबकि भारत में  अछूतों की गुलामी अप्रत्यक्ष ।।प्रत्यक्ष ग़ुलामी में गुलाम होने वाले को गुलामी का एहसास होता है जिससे वो उसका प्रत्यक्ष विरोध करता है जबकि अप्रत्यक्ष गुलामी में गुलामी में गुलाम होने वाले को गुलामी का एहसास नही होता और वो उसका कभी भी विरोध नही करता ।
लेकिन बाबा साहेब इस अप्रत्यक्ष गुलामी को समझ चुके थे और उन्होंने उनके लोगो की दशा को उनका भाग्य नहीं अपितु  इस गुलामी पर ईश्वरीय भाग्य का अप्रत्यक्ष चादर चढ़ा हुआ है,वो भली भांति समझ रहे थे जिसके कारण उन्होंने इसका विरोध शुरू किया और इसका पतन शुरू हुआ ।
लेकिन आज भी कुछ लोग इस गुलामी की जंजीरों में अप्रत्यक्ष रूप से जकड़े है और उन्हें ये एहसास ही नही की वो गुलाम है । ऐसे लोग अपने ही समाज,संगठन को तर्क के आधार पर ढेर करते है,किसी कार्य की निंदा करते है और संगठन शक्ति में शिथिलता लाते है ।
ऐसे लोग भले ही हमारे समाज के है लेकिन आप जानते है की लोहे की एक चैन मजबूत तभी होती है जब उसका हर कड़ी मजबूत होता है अन्यथा कड़ी सदैव वहीं से टूटेगी जहाँ कहिं भी वो कमजोर कड़ी जुड़ा होगा ।।।

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1 comment :

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